सोमवार, 12 सितंबर 2011

अमर को वर्चुअल वर्ल्ड की सुहानुभूति

सत्यजीत चौधरी
किसकी मजाल है कि जो छेड़े दिलदार को, गर्दिश में घेर लेते हैं कुत्ते भी शेर को, आपने बिग बी तक न जाने कितने लोगों की सहायता की है लेकिन आज कोई पास या साथ नहीं है, हम हैं...यह शब्द हैं समाजवादी पार्टी के पूर्व महासचिव और सांसद अमर सिंह के फेसबुक अकाउंट पर पेस्ट किए गए एक शुभचिंतक के। भले ही आज अमर सिंह तिहाड़ जेल में होने की वजह से खुद अपनों से दूर हो गए हों लेकिन आज भी उनके ऐसे साढ़े चार हजार से ज्यादा मित्र हैं जो लगातार उनकी सलामती की दुआ कर रहे हैं और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। इस मुसीबत से जल्द बच निकलने को उत्साहित कर रहे हैं।

शनिवार, 10 सितंबर 2011

अब कड़े और बड़े फैसले लेने होंगे

  सत्यजीत चौधरी
11/7, 26/11, 13/7, 7/9....! ये महज तारीखें नहीं हैं। ये हैं उन जख्मों के निशान हैं जो दहशतगर्द हमें लगातार दे रहे हैं। वे बार-बार लौटकर आते हैं। हर बार और भी भयानक रूप के साथ। वे सिर्फ जिंदगियां नहीं छीनते, बल्कि बहुत कुछ छीन ले जाते हैं। वे बच्चों के चेहरे से मुस्कान नोंच लेते हैं। वे मांगों से सिंदूर मिटा देतें हैं। वे परिवारों के मुंह से निवाला झपट लेते हैं। 
   नक्सलबाड़ी, खालिस्तान, कश्मीर, लिट्टे...सत्तर के दशक के बाद से लगातार अलग जमीन, अलग मुल्क के नाम पर भारत के सीने पर जख्म पर जख्म दिए जा रहे हैं। इस नफरत ने हमसे हमारे कई नेता छीन लिए। हमारी विकास प्रक्रिया को बाधित किया। हमें खौफ के साये में जीने के लिए मजबूर किया।
    सरकारें आती रहीं और जाती रहीं, लेकिन हम आतंकवाद के मूल को न तो ठीक से समझ पाए और न ही उनको जड़ से खत्म करने का तरीका ढंूढ पाए। आतंकवाद को लेकर सरकारों का रवैया भी कम दोषपूर्ण नहीं हैं। हम बार-बार उनके दबाव में आते रहे। 1989 में रूबिया सईद का आतंकियों ने अपहरण कर लिया। जम्मू—कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री एवं तत्कालीन केंद्रीय मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद के बेटी को मुक्त कराने के लिए जेकेएलएफ के पांच दहशतगर्दों को सरकार को छोड़ना पड़ा। फिर कंधार कांड मामले में भी हम घुटनों के बल आ गए। 1999 में अपहृत विमान यात्रियों की मुक्ति के लिए तत्कालीन केंद्रीय मंत्री जसवंत सिंह खुद आतंकियों को लेकर कंधार जाना पड़ा था।

शुक्रवार, 9 सितंबर 2011

........तो सबको है अन्ना की तमन्ना


सत्यजीत चौधरी
  अन्ना हजारे ने सिर्फ भष्टाचार के खिलाफ अलख नहीं जगाई है, उन्होंने हमारे जमीर को भी जगाया है। हमारे सरोकार को उद्वेलित किया है। नजीजे सामने आने शुरू हो गए हैं। लोग समझ चुके हैं कि मामूली से दिखने वाले इस फकीर के पास सत्य, अहिंसा और प्रण की ऐसी ताकत है, जो अच्छे-अच्छे को झुकने पर मजबूर कर दे। लोगों को हर मसले का हल अन्ना के पास नजर आने लगा है। यही वजह है कि मुख्य धारा से कटकर कश्मीर में अपना आंदोलन चला रहे अलगावादी संगठन हुर्रियत कांफ्रेंस ने भी अन्ना से गुहार लगाई है कि वह कश्मीर आएं और कश्मीरियों पर हो रहे जुल्म से निजात दिलाएं। हुर्रियत के उदारवादी धड़े के नेता मीरवाइज उमर फारूख ने कश्मीर घाटी में निर्दो लोगों की हत्या रोकने के लिए अन्ना और उनकी टीम की मदद मांगी है।

बुधवार, 7 सितंबर 2011

कब तक, आखिर कब तक चलेगी यह जंग ?

सत्यजीत चौधरी
    दहशतगर्द दिल्ली के सीने पर एक और जख्म दे गए। रंज इस बात का कि इस बार उन्होंने बताकर राजधानी को लहूलुहान किया है। ठीक तीन महीने तेरह दिन पहले उन्होंने मौत का रिहर्सल किया था और बुधवार को फाइन शो में बारह बेकुसुर मारे गए। 85 से ज्यादा घायल हैं। भगवान करे कि सब चंगे हो जाएं और धमाके से सदमे से उबरकर जल्द से जल्द जिंदगी के कारोबार से जुड़ जाएं।
  विस्फोट की खबर टीवी न्यूज चैनलों पर आने के बाद उन लोगों के होश उड़ गए, जिनके परिजन किसी काम से हाईकोर्ट गए थे। लोकनायक जयप्रकाश, राम मनोहर लोहिया, सफदरजंग अस्पताल और एम्स में लोग बदहवासों की तरह अपनों को तलाश रहे थे। धमाकों में मारे गए लोगों की लाशों पर पछाड़ खा रहे परिजनो का रुदन ने सबको हिलाकर रख दिया।

तिहाड़ जेल बना नेताओं का ठिकाना

                                                         सत्यजीत चौधरी, 
   कभी बड़े और खूंखार किस्म के अपराधियों का ठिकाना कहलाने वाली तिहाड़ जेल में अब नेताओं का भी आना जाना शुरू हो गया है। इसकी शुरुआत भले ही कलमाड़ी और राजा ने की हो, लेकिन इसके बाद से यह सिलसिला ऐसा चला कि नेता भी अपराधों के आरोप में तिहाड़ भेजे जा रहे हैं। ताजा वाकया सपा के पूर्व महासचिव व राज्यसभा सांसद अमर सिंह का है। अमर को भी अब कैश फोर वोट कांड के आरोप में 14 दिन की न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेज दिया गया है। अब अमर सिंह को जेल की सेल नंबर एक में पूर्व संचार मंत्री ए राजा के साथ रखा जाएगा।

रोकनी होगी पानी की बरबादी

सत्यजीत चौधरी, 
सन् 2007 में केंद्रीय भूमिगत जल बोर्ड ने एक रिपोर्ट जारी की थी, जिसका निचोड़ था कि 2025 तक सिंचाई के लिए भूमिगत जल उपलब्धता ऋणात्मक हो जाएगी। रिपोर्ट का यह सार गंभीर खतरे की तरफ इशारा कर रहा है। हम लगातार धरती का दोहन कर रहे हैं। खेती, पेयजल और उोग—धंधों के लिए बेतहाशा भूमिगत जल स्नेतों का दोहन कर रहे हैं।
हालात कितने खराब हो चुके हैं, इसे दिल्ली की मिसाल से समझ जा सकता है। राजधानी की पानी जरूरत 427.5 करोड़ लीटर है, जबकि उपलब्धता है महज 337.5 करोड़ लीटर। इस शहर की पानी की जरूरत पूरी करने के लिए गंगा, यमुना, भाखड़ा नांगल बांध और रेणुका सागर बांध से पानी लिया जा रहा है। यह अनुमान लगाया जा रहा है कि राजधानी से 2015 में भूमिगत जल समाप्त हो जाएगा, यानी मात्र तीन वर्ष बाद।
उत्तर प्रदेश में हालात और भी खराब हैं। प्रदेश में 13 लाख हेक्टेयर खेती सिंचित है, जिसका बड़ा हिस्सा भूमिगत जल पर निर्भर है। नहरों से होने वाली सिंचाई का क्षेत्रफल बढ़ने की बजाय घटने लगा है। राज्य में बुंदेलखंड, पश्चिम उत्तर प्रदेश में नहरों के अलावा खेतों में लाखों की संख्या में नलकूप लगे हैं, जो लगातार धरती की कोख से जीवन का रस सोख रहे हैं। यूपी के ढाई दर्जन जिलों में भूमिगत जल खतरनाक स्तर तक नीचे खिसक गया है। उत्तर प्रदेश के कुल 860 ब्लॉक में से 559 की स्थिति बहुत खराब हो चुकी है।