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शनिवार, 31 दिसंबर 2011

वैश्विक विरोध और आम आदमी

सत्यजीत चौधरी
     अमेरिका और यूरोप के कई देशों में इस साल सर्दियों की मस्ती नहीं है, गुस्से की गर्माहट है। खून जमा देने वाली सर्द हवाओं के बीच लोग क्रिसमस मनाने के लिए नहीं, बल्कि पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ सड़कों पर डेरे डाले बैठे हैं। लंदन के एक चर्चयार्ड में सेंट पॉल्स कैंप के आंदोलनकारियों को हटाने के लिए सरकार कोर्ट की शरण में जा पहुंची है। अमेरिका में भी विरोध -प्रदर्शन जारी हैं। शेयर मार्केट, मुक्त बाजार और पूंजीवादी अर्थतंत्र के विरुद्ध लोगों की नाराजगी सातवें आसमान पर है। यों कह सकते हैं कि लंबे समय के बाद दुनियाभर में बहुसंख्यक कामकाजी आबादी अल्पसंख्यक पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ उठ खड़ी हुई है। यह एक फीसद अमीरों के खिलाफ निनान्बे फीसद आम आदमी की जंग है।
हर तरफ लोग गुस्से से लबालब हैं। लंदन के पूंजीवाद विरोधी प्रर्दानकारियों ने खनन क्षेत्र की बड़ी कंपनी एक्स्ट्रॉटा के मुख्यालय पर धावा बोला और कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी को निशाना बनाने की कोशिश की। 

मंगलवार, 20 दिसंबर 2011

सात समंदर पार भी मेरठ की खुशबू का अहसास

सत्यजीत चौधरी
 एक हस्तिनापुर मेरठ में बसता है जो इतिहास के पन्नों में सुनहरे अक्षरों में अंकित है और एक हस्तिनापुर सात समंदर पार भी बसता है, जहां की खुशबू और भारतीय अंदाज बरबस ही लोगों को अपना दीवाना बना लेता है। यहां न केवल भारतीय देवी-देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं, बल्कि 12 एकड़ में बने इस हस्तिनापुर में हर रोज माहौल भक्तिमय होता है।
    यहां एक दर्जन से ज्यादा भारतीय देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के साथ ही अर्जेटीना के भी कई देवी- देवताओं की मूर्तियां स्थापित की गई हैं। खास बात यह है कि वहां भी भगवान गणोश, कृष्ण, सूर्य, नारायण और शिव की प्रतिमाओं के लिए अलग से मंदिरों का निर्माण किया गया है। चूंकि यह हस्तिनापुर है, इसलिए यहां भी पांडवों के मंदिर मौजूद हैं।

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

डांवाडोल रुपये पर सवार बाजार

सत्यजीत चौधरी 
"भारत की अर्थव्यवस्था में यह मंदी का दौर है। इसका कोई आसान समाधान नहीं है। असर बढ़ सकता है। विदेश में जो हो रहा है, उसके मद्देनजर सरकार बेहतर काम नहीं कर पा रही है। किसी तरह के बड़े प्रयास करके सरकार घाटा बढ़ाना नहीं चाहती। योजना आयोग के उपाध्यक्ष का साफ संकेत है कि वित्तीय घाटा अभी और बढ़ सकता है।"
   एक बार फिर शेयर बाजार, बेजारी के आलम में है। रात को खरीदे जाने वाले शेयर सुबह होते ही कितने का चूना लगा दें, अंदाजा लगाना भी मुश्किल हो गया है। सुपर पॉवर अमेरिका का शेयर बाजार हो या चीन का, हर जगह मंदी ने निवेशकों को गम देना शुरू कर दिया है। इस बीच भारत में रुपये की घटती वैल्यू ने निवेशकों से लेकर आम जनता तक के लिए मुसीबत खड़ी कर दी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में अमेरिका का डॉलर तेजी से मजबूत हो रहा है, जिससे रुपया कमजोर हो रहा है। ‘यूरो’ भी रुपये की माफिक तेजी से कमजोर पड़ रहा है। यूरोप की आर्थिक स्थिति के दीवालिया होने से लगातार अमेरिका को मजबूती मिल रही है। मतलब यह नहीं है कि अमेरिका की आर्थिक स्थिति ज्यादा मजबूत होने से डॉलर मजबूत हो रहा है। दरअसल, डॉलर और यूरो के बीच ऐसा तालमेल है, कि एक मजबूत तो दूसरा कमजोर होता है। पिछले दिनों अमेरिकी डॉलर की गिरती वैल्यू के लिए यूरो की मजबूती मुख्य वजह थी। डॉलर की मजबूती की एक और मुख्य वजह है कि दुनियाभर में जितना निवेश हो रहा है, वह डॉलर में ही किया जा रहा है। पूरा कारोबार अंत में डॉलर पर आकर टिक गया है। डॉलर की ताकत तभी बढ़ती है, जब उसके मुकाबले बाकी लगभग 192 देशों की मुद्राएं कमजोर होने लगती हैं।

मंगलवार, 29 नवंबर 2011

गजब : डॉलर लुटाकर रुपये की लालसा

-अमेरिकी रिटेल कंपनियों ने भारतीय बाजार में अपना रास्ता साफ करने के लिए की है लॉबिंग
सत्यजीत चौधरी
भारत में विदेशी रिटेल कंपनियों की राह आसान होने के पीछे एक बार फिर लॉबिंग का भूत सामने आता दिखाई दे रहा है। अमेरिकी सीनेट में पेश वॉलमार्ट की लॉबिंग डिस्क्लोजर रिपोर्ट के मुताबिक कंपनी ने रुपए में अपनी पैठ बनाने के लिए भारत में भी जमकर लॉबिंग की है। हालांकि अमेरिका में लॉबिंग को कानूनी मान्यता प्राप्त है लेकिन भारत में इसे आज भी गैर कानूनी ही माना जाता है। दूसरी ओर, देशभर में इस रिटेल कंपनियों के निवेश को लेकर विरोध के स्वर तेज हो गए हैं। देश के कई राज्यों ने इस पर सख्त ऐतराज जताया है तो दूसरी ओर सोमवार को संसद का सत्र भी रिटेल एफडीआई की भेंट चढ़ गया।