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मंगलवार, 18 फ़रवरी 2014

उम्मीदों के मुख्यमंत्री !

सत्यजीत चौधरी  
  पहाड़ की तुलना धैर्य से की जाती है। अडिग—अविचल खड़ा पहाड़ जाने क्या—क्या झेलता है। मौसम की मार, खनन के हथोड़े, हिमपात, बरसात, भूस्खलन....@...लेकिन एक वक्त ऎसा भी आता है, जब पहाड़ का सब्र टूट जाता है। उत्तराखंड में बदरीनाथ में प्रकृति का तांडव हुआ, उसकी भयानक अनुगूंज राजनीतिक गलियारों में भी सुनाई दी। जब इस गूंज को अनसुना कर दिया गया तो विजय बहुगुणा की कुर्सी चली गई और हरीश रावत को मुख्यमंत्री का पद मिल गया।
     कुमाऊं और गढ़वाल के खांचों में बंटे तेरह साल पुराने इस राज्य में गुटबाजी हमेशा हावी रही। कांग्रेस की सरकार रही हो या भाजपा की, खेमेबंदी से नहीं उबर पाईं। दोनों ही दलों की सरकार में मुख्यमंत्री को बदलकर हालात बदलने की जुगत को ही निदान मान लिया गया। मर्ज की असली वजह पहचनने की कोशिश नहीं हुई। तेरह—सवा तेरह साल की इस सरकार की कमान संभालने जा रहे हरीश रावत गुटबाजी पर नियंत्रण पाकर कैसे अपनी सरकार बचा पाएंगे, यह वक्त ही बता पाएगा।

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

कब मिलेगा पश्चिमी यूपी को 'इंसाफ'

सत्यजीत चौधरी
     एक बड़े औद्योगिक हब में ढल रहे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के साथ पिछले कई दशकों से छल हो रहा है। सबसे ज्यादा राजस्व देकर देश और प्रदेश के आर्थिक विकास को गति देने वाले उत्तर प्रदेश के इस हिस्से की कई मांगों को दशकों से नजरंदाज किया जा रहा है। राज्य का पुनर्गठन कर छोटे राज्यों को आकार देने की पुरानी मांग पर तो सियासत चल रही है, अच्छी सडक़ें, रेल क्षेत्र का विस्तार जैसी मांगें भी अनदेखी की जा रही हैं। इनमें एक और महत्वपूर्ण मांग को राजनीतिक दलों ने वर्षों से कांख के नीचे दबा रखा है। यह है पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट की बेंच की मांग। यहां पृथक बेंच की स्थापना को लेकर दशकों से आंदोलन चल रहा है। कभी आंदोलन की आंच मद्धम पड़ जाती है तो कभी तेज हो जाती है, लेकिन राज्य और केंद्र की सरकारों ने जनता और
इलाके के वकीलों की सस्ता न्याय पाने की इस जायज मांग को लेकर कभी दिलचस्पी नहीं दिखाई है।

सांसत में पश्चिम के मुवक्किल
    इलाहाबाद हाईकोर्ट में चल रहे मुकदमों की पैरवी पश्चिमी यूपी के लोगों के लिए कई तरह से झंझटों और परेशानी भरा काम है। एक आम आदमी जिला न्यायालय से वाद हारने के बाद हाईकोर्ट में अपील करने के बारे में सोचकर ही कांप उठता है। कई मामलों में लोग थक-हार कर जिला न्यायालय के फैसले को सिर-माथे लगा लेते हैं और जो मुकदमा आगे लडऩे की हिम्मत जुटा पाते हैं, उनके लिए इलाहाबाद तक का लंबा सफर तय कर पहुंचना और वकीलों की फीस भरना किसी डरावने सपने सरीखा होता है। मेरठ को मानक मानकर चलें तो यहां के मुवक्किल को इलाहाबाद तक के करीब सात सौ किलोमीटर का सफर ट्रेन से तय करने में दस से बारह घंटे तक का समय लगता है।
      कई बार मुवक्किल को अपने वकील के बस्ते पर पहुंचकर पता चलता है कि आज कोर्ट नहीं बैठेगी। कई बार हड़ताल हो जाती है। कई मौकों पर दूसरी पार्टी अगली तारीख का जुगाड़ कर लेती है। एेसे मौकों पर वकील तो अपनी फीस ले लेता है और बेचार मुवक्किल लुटे होने के अहसास के साथ लौट आता है।
    दूसरी समस्या भाषा, खानपान और होटल में ठहरने की है। हाईकोर्ट के आसपास सरकार ने दूर-दराज से आए मुवक्किलों के ठहरने की कोई व्यवस्था नहीं की है। अगर इलाहाबाद हाईकोर्ट की बेंच लखनऊ के अलावा मेरठ या मुजफ्फरनगर में स्थापित कर दी जाए तो लोगों को ज्यादा सुविधा रहेगी। ये दोनों शहर रेल और सडक़ मार्ग से जुड़े हैं। आने वाले समय में मोनो रेल चलने से यात्रा और भी सुगम हो जाएगी। समय और खर्च, दोनों परेशानी से लोग बच जाएंगे। 

बुधवार, 15 मई 2013

जाट आरक्षण का टूटता, बिखरता भटकता रण

सत्यजीत चौधरी
  
अब यह समझना मुश्किल हो गया है कि जाट ज्यादा भोले हैं या आरक्षण के मुद्दे पर उनका कथित नेतृत्व कर रहे नेता और सरकारें ज्यादा चालाक। आजाद भारत के इतिहास अब तक इतना भटका, बिखरा और संदेहों से भरा कोई आंदोलन नहीं हुआ है। इस आंदोलन का सबसे दुखद पहलू है इसका कोई असली माई-बाप न होना। लगातार पैदा हो रहे नेता आंदोलन की ताकत लगातार बंट और बिखरा रहे हैं। पर्दे के पीछे चल रही चल रहीं दुरभि संधियां आंदोलन की रीढ़ पर सतत वार कर रही हैं।
    जाट आरक्षण की मांग को लेकर अपनी दुकानों के साथ ढेरों नेता मैदान में हैं। दो—तीन बड़े संगठनों जैसे अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति (पार्ट वन और पार्ट टू) और संयुक्त जाट आरक्षण संघर्ष समिति के अलावा पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब में ढेरों जाट संगठन उग आए हैं। हद तो यह है कि हाल में ही दिल्ली स्थित मावलांकर हॉल में अखिल भारतीय जाट महासम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसमे पूर्व केंद्रीय मंत्री नटवर सिंह और पूर्व लोकसभा अध्यक्ष बलराम जाखड़ के अलावा हरियाणा का मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने शिरकत की। हरियाणा और पंजाब के कई पूर्व और मौजूदा मंत्री सम्मेलन में मौजूद थे। इस दौरान समुदाय के नेताओ ने आरक्षण की लड़ाई को धार देने के लिए आंदोलन की कमान तेज-तर्रार नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री अजय सिंह को सौंपने का निर्णय लिया। यानी आरक्षण के मुद्दे पर एक और जाट नेता का उदय।
    दरअसल जाट आरक्षण आंदोलन की बासी—सी हो चली कढ़ी में एक बार फिर उबाल लाने की कोशिश की जा रही है। इस आंदोनल का स्वरूप शुरू से ही उग्र रहा है। कभी दिल्ली को पानी की सप्लाई रोककर तो कभी निषेध को तोडक़र कांग्रेस अध्यक्ष के आवास की तरफ कूच कर जाट नेता लगातार उद्दंड तेवर दिखाते रहे हैं। हाल में दिल्ली स्थित जंतर-मंतर पर एक गुट ने दूसरे को धरने को हाईजैक करने की कोशिश की। हाल में ही केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे के सरकारी आवास में कुछ जाट आंदोलनकारियों ने घुसकर तोडफ़ोड़ की।

शनिवार, 6 अप्रैल 2013

विकास के लिए जरूरी है सही ऊर्जा स्रोत की खोज

सत्यजीत चौधरी
    सिर पर सवार सूरज अग्नि वर्षा कम करने को तैयार नहीं है। पारा नई-नई ऊंचाइयां गढ़ रहा है। राजधानी दिल्ली से लेकर सबसे पिछड़े राज्य बिहार में बिजली की किल्लत से हाहाकार मचा हुआ है। बिजली नहीं है तो पानी भी नदारद है, लिहाजा जनता जर्नादन प्यास से भी बिलबिला रही है। ऐसी ही हालत कुछ देश की आर्थिक सेहत की है। गंभीर संकट से गुजर रहे देश में रुपए और सकल घरेलू उत्पाद का गिरना यह बता रहा है कि देश की आर्थिकसेहत किस खतरनाक हद तक गिर चुकी है। पिछले एक पखवाड़े से तमाम आर्थिक परेशानियां, रुपए के अवमूल्यन और गिरती उत्पाद दर को भूलकर हमारे सियासतदां राष्ट्रपति चुनने की कवायद में जुटे हैं। स्टैंडर्ड एंड पूवर्स की रेटिंग चेतावनी को नजरंदाज कर सरकार निश्चिंत है कि हालात सुधार लिए जाएंगे, लेकिन सरकार चाहे जितनी बेफिक्र हो, हकीकत तो यह है कि आर्थिक नाकामियों, बढ़ती महंगाई और सरकार की अस्थिर हालत ने जनता को गहरे अवसाद में डाल दिया है। पेट्रोल की बढ़ी कीमतों से जनता अभी उबरी भी नहीं थी कि प्रचंड गर्मी में उसे बिजली और पानी के संकट ने घेर लिया है।

सोमवार, 6 फ़रवरी 2012

सबसे बड़े प्रदेश की तकलीफ

सत्यजीत चौधरी 
     उत्तर प्रदेश की चुनावी रणभेरी के बारे में एक कहावत चरितार्थ है कि यहां सुबह का सूरज नई उम्मीद लेकर आता जरूर है, लेकिन रात के अंधेरे में जो बदलाव होते हैं, वह पलभर में पूरी सत्ता और राजनीतिक पार्टियों पर भारी साबित होते हैं। सबसे पहले इसे दुनिया के नजरिए से देखते हैं। अगर उत्तर प्रदेश को देश मान लिया जाए, तो लोकतंत्र के लिहाज से यह दुनिया के 172 देशों में सबसे बड़ा लोकतांत्रिक चुनाव है। उत्तर प्रदेश में 41 मुख्यमंत्री बदल चुके हैं।
इनमें से केवल गोविंद बल्लभ पंत, संपूर्णानंद और मायावती ने ही सत्ता के पांच साल पूरे किए हैं। 33वां चुनाव देख रही यूपी की जनता ने 16 विधानसभा और 17 लोकसभा के चुनाव में हिस्सेदारी की है। यह संख्या पश्चिम बंगाल और बिहार जैसे पुराने राज्यों से भी ऊपर है। इतना बड़ा राज्य, इतने मतदाता और इतनी बड़ी संख्या में नेता हों, तो भला राजनीति चरम पर होगी ही। इस बार भी राजनीतिक उठापटक तेज है। जाति, धर्म व समुदाय के वोट पर कब्जे की कवायद है, तो नए फंडे भी हैं, जिनमें राजनीतिक लोग कामयाबी की किरण देख रहे हैं।

सोमवार, 16 जनवरी 2012

मुलायम के लिए कम नहीं हैं चुनौतियाँ

सत्यजीत चौधरी  
    चुनावी डुगडुगी पिट चुकी है। चारों तरफ सुनो—सुनो, चुनो—चुनो का शोर है। उत्तर प्रदेश में सभी राजनीतिक दल कमर कसकर चुनावी समर में कूद चुके हैं। खुद को कूतने और दूसरों को आकने की कसरत जोरों पर है। हाथी और साइकिल गलियों-मोहल्लों में निकल चुके हैं। हाथ भी वरदहस्त की मुद्रा में लोगों को रिझा रहा है। कमल खिलने को बेताब है। हैंडपंप भी प्यास बुझाने का बादा कर रहा है। मीडिया ने भी तैयारियां शुरू कर दी हैं। सर्वे और पोल्स के लिए आंकड़े जुटाने टीमें निकल चुकी हैं।

रविवार, 15 जनवरी 2012

प्रत्याशी जी सावधान, जासूस पीछे लगा हो सकता है!

सत्यजीत चौधरी 
  कहते हैं जो जीता वही सिंकदर। पराजय शब्द कोई भी  अपनी डिक्शनरी में नहीं रखना चाहता। राजनीति कर अपनी रोजी—रोटी चलाने वाले नेता तो बिल्कुल भी  नहीं। उत्तर प्रदेश में चुनाव की इस बेला में प्रत्याशी अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए तरह—तरह के टोटके आजमा रहे हैं। इस हाईटेक दौर में कई नेताओं ने सोशल नेटवर्किंग साइट्स फेसबुक और ट्वीटर पर अकाउंट बनाकर अपनी प्रोफाइल से वोटरों को रिझा रहे हैं। कुछ ने और आगे जाकर जासूसों का सहारा ले लिया है। यानी विरोधियों की कमियों और ताकत का पता लगाने के साथ अपनी खामियों को दुरुस्त करने के लिए डिटेक्टिव एजेंसियों का सहारा ले रहे हैं।

गुरुवार, 12 जनवरी 2012

पैसा, शोहरत और अपराध में यूपी नंबर वन

सत्यजीत चौधरी
पैसा, शोहरत और अपराध, आज की राजनीति के यह तीन ऐसे चेहरे हैं जिनके बिना जनता के बीच नेता गुमनाम सा कहा जा सकता है। पांच राज्यों यूपी, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर और गोवा में इस साल चुनाव होने जा रहे हैं। पांच राज्यों का चुनावी विश्लेषण किया है एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स और नेशनल इलेक्शन वाच ने। इस विश्लेषण में कई चौंकाने वाली बातें सामने आई हैं। सबसे अहम बात यह है कि उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती, बाकी चार राज्यों के मुख्यमंत्रियों की अपेक्षा सबसे ज्यादा अमीर है। दूसरी बात यह सामने आई है कि अपराध के मामले में भी यूपी ही नंबर वन है। खास बात यह है कि यूपी के विधायक भी सबसे ज्यादा करोड़पति हैं। एडीआर की ओर से जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ही सबसे ऊपर आती हैं। मायावती की कुल संपत्ति 87.27 करोड़ रुपए है जबकि मणिपुर के मुख्यमंत्री आक्राम इबोबी सिंह की संपत्ति सबसे कम केवल छह लाख नौ हजार रुपए है।

सोमवार, 9 जनवरी 2012

सीईसी के आदेश के बाद मूर्ति युद्ध छिड़ने का अंदेशा

सत्यजीत चौधरी
   नोएडा और लखनऊ में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती की प्रतिमाएं और उनकी पार्टी बसपा के चुनाव चिह्न से मिलती—जुलती हाथी की मूर्तियों को ढकने के चुनाव आयोग के फरमान के बाद पूरे देश में स्टेचू वॉर यानी मूर्ति युद्ध छिड़ने का अंदेशा पैदा हो गया है। उत्तर प्रदेश की आग अब पंजाब के पटियाला शहर पहुंच चुकी है। वहां अकाली दल के पूर्व मंत्री सरदारा सिंह कोहली की प्रतिमा को लेकर विवाद शुरू हो गया है। इसका सूत्रपात किया है अकाली दल के ही एक स्थानीय पार्षद सोहन लाल जलोटा ने। उन्होंने चुनाव आयोग को इस बारे में चिट्ठी लिख मारी कि शहर के आराधना चौक के पास पूर्व अकाली मंत्री की मूर्ति लगाई गई है। उनका कहना है कि ठीक है कि वह अकाली दल के पार्षद हैं, लेकिन नियम तो नियम होते हैं। उनका कहना है कि अब यह चुनाव आयोग का काम है कि वह तय करे कि यह आचार संहिता का मामला है या नहीं।

शुक्रवार, 6 जनवरी 2012

दाग अच्छे नहीं हैं

सत्यजीत चौधरी
उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने चुनाव की घोषणा होने के बावजूद अपने मंत्रिमंडल से कई मंत्रियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया। जनता के सामने यह संदेश देने की कोशिश की गई कि मायावती का यह स्टंट भष्टाचार के खिलाफ बन रहे माहौल में एक अच्छा चुनावी फंडा कहा जा सकता है लेकिन पर्दे के पीछे की सच्चाई चौंकाने वाली है। इस सच्चाई से अब पर्दा उठ रहा है और मायावती का एक पंथ दो काज का फंडा भी  सामने आ रहा है। फिलहाल मायावती भले ही कुछ भी दावे करे लेकिन सच्चाई यह है कि दागदार होने की वजह के साथ ही पिछले विधानसभा  चुनावों में इन हटाए गए मंत्रियों में से ज्यादातर कम मतों से विजयी हुए थे जो कि इस बार बसपा के लिए मुश्किलों भरे हो सकते थे।

गुरुवार, 5 जनवरी 2012

माया की ‘माया’ से बचना आसान न होगा

सत्यजीत चौधरी
उत्तराखंड में चुनाव की अधिसूचना जारी हो चुकी है। उत्तर प्रदेश के लिए चार दिन बाद हो जाएगी। यह एक संसदीय औपचारिकता है। बात यह है कि दोनों राज्यों में चुनाव की बिसात बिछ चुकी है। मुद्दे रूपी मोहरे चले जा रहे हैं। चुनाव को लेकर पार्टियां उत्साह में है, लेकिन इस बार चौतरफा चल रहे सीईसी के डंडे से सहमी हुई भी हंै। लाख कोशिश है कि आचार संहिता का आदर बना रहे, लेकिन चूक हो ही जा रही है। कांग्रेस पहले ही मिशन यूपी को लेकर जी-जान से जुट चुकी है तो उत्तराखंड में भाजपा के हौसले पहले से ही खंडूरी की सरकार की पाक-साफ छवि की वजह से बुलंद दिखाई दे रहे हैं। हालांकि कांग्रेस या भाजपा की ओर से केवल ऊपरी तौर पर सोच बदली और रखी जाती है जबकि बसपा का जमीनी जुड़ाव दरकिनार नहीं किया जा सकता। यह बात काबिलेगौर है कि बसपा आज भी धरातल पर सपा, कांग्रेस और भाजपा से ज्यादा मजबूत कही जा सकती है। ऐसे में मायावती को हल्के में लेकर चलना राजनीतिक पार्टियों की भारी भूल साबित हो सकती है। मायावती उत्तर प्रदेश ही नहीं पंजाब और उत्तराखंड में भी निर्णायक भूमिका में सामने आ सकती है।

मुश्किल में भाजपा

सत्यजीत चौधरी
हर कदम पर बचकर चलना ही अब भाजपा के लिए मुसीबत साबित होता दिखाई दे रहा है। पार्टी की ओर से पांच राज्यों के चुनाव के मद्देनजर कुछ ऐसे निर्णय लिए गए हैं जो कि अब गले की फांस बनते जा रहे हैं। पहले से ही बसपा के पूर्व नेता और मायावती के खासमखास बाबू सिंह कुशवाहा को पार्टी में शामिल कर अपनी फजीहत करा चुकी भाजपा ने अब एक और विवादित नेता को पार्टी का टिकट थमा दिया है। सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना घोटाले में मुख्य तौर पर सामने आए पूर्व सांसद साक्षी महाराज को भी  अब भाजपा ने अपने आंगन की छांव दे दी है। दूसरी ओर पूर्व क्रिकेटर व सांसद नवजोत सिंह सिद्धू की पत्नी नवजोत कौर सिद्धू को भी  पार्टी ने चुनाव का टिकट दिया है। भाजपा के हाल के फैसलों को लेकर राष्टÑीय स्वयंसेवक संघ ने सख्त नाखुशी जाहिर कर दी है।

बुधवार, 4 जनवरी 2012

नीतीश कुमार बने कांग्रेस के आदर्श !

सत्यजीत चौधरी
   बिहार की आरजेडी चीफ लालू प्रसाद यादव के वोट बैंक में सेंध लगाकर मुस्लिम और यादव वोट बैंक के सहारे से बिहार की सत्ता हासिल करने वाले सीएम नीतीश कुमार अब यूपी में कांग्रेस के लिए आदर्श साबित होने जा रहे हैं। पार्टी ने नीतीश कुमार की तर्ज पर केंद्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा को अपना वोट बैंक देखकर चल रही है। माना जा रहा है कि अगर बेनी प्रसाद कुर्मी और सपा के वोट बैंक मुस्लिमों को तोड़ने में सफल हो जाते हैं तो कांग्रेस का लखनऊ की कुर्सी का बीस साल का इंतजार समाप्त हो सकता है। हालांकि फिलहाल यह इतना आसान दिखाई नहीं दे रहा है।

मंगलवार, 3 जनवरी 2012

बसपा, भ्रष्टाचार और बगावत

सत्यजीत चौधरी
पांच साल पहले जब मायावती ने पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाई थी तो उनके तेवर और ईमानदार छवि, दोनों ही जनता के दिलो दिमाग में चलती थी। पांच साल बीतने के साथ ही जनता के बीच मायावती की घटी लोकप्रियता बयां करती है कि कहीं न कहीं बसपा का ग्राफ इस बार घटा है। अपनी इज्जत को बरकरार रखने के लिए हालांकि मायावती ने एक या दो नहीं 20 मंत्रियों और दूसरे नेताओं को बाहर का रास्ता दिखा दिया है। इनमें से कुछ को पार्टी से भी  निस्कासित कर दिया है तो कुछ का ओहदा उनसे छीन लिया गया है। हालांकि जिन लोगों को ओहदा छीना गया है, वह खुद ही अब बसपा का साथ छोड़कर दूसरे दलों में शामिल होने लगे हैं। इनमें से अभी  तक कुल चार पूर्व मंत्री भाजपा में शामिल हो चुके हैं।

सोमवार, 2 जनवरी 2012

विवाद, हाजी याकूब और दल बदलू राजनीति

सत्यजीत चौधरी
    कुरैशी बिरादरी में एक अलग ही शान रखने वाले हाजी याकूब कुरैशी का राजनीतिक कैरियर हमेशा से ही विवादों से घिरा हुआ रहा है। पहले मोहम्मद साहब का कार्टून बनाने वाले का सिर कलम करने पर ईमान देने का बयान आने के बाद पिछले साल एक बार फिर सिख समुदाय को लेकर उन्होंने आपत्तिजनक टिप्पणी की। इस टिप्पणी ने उन्हें बसपा से बाहर कर दिया। राजनीतिक मंच की तलाश में जुटे रहे हाजी याकूब ने पहले अपने बेटे इमरान को रालोद में जगह दिलाई। रिश्तों में मधुरता आने के साथ ही चुनाव से ऐन वक्त पहले हाजी याकूब ने अब अपने साथ कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर रालोद ज्वाइन कर ली है। इससे मेरठ की राजनीति में एक अलग भूचाल आने के साथ ही मायावती के लिए इसे एक बड़े झटके के तौर पर भी  देखा जा रहा है।

छोटे दल, बड़ी चुनौती

-यूपी की सियासत में अपनी ताल ठोंक रहे हैं छोटे और धार्मिक आधार पर बने दल

सत्यजीत चौधरी
 उत्तर प्रदेश में चुनावी महासंग्राम के बीच लगातार कई नए-नए राजनीतिक समीकरण सामने आना शुरू हो गए हैं। एक ओर जहां बड़े राजनीतिक दल अंदरूनी कलह और राजनीति का शिकार हो रहे हैं तो दूसरी ओर समाज या धर्म प्रधान छोटे दल भी उत्तर प्रदेश की सियासी माहौल में बड़ी चुनौती के तौर पर उभर रहे हैं। इन छोटे दलों को दूसरी पार्टियां हालांकि अपने लिए एक वोट पाने का जरिया मानती हैं लेकिन यह अगर एक हो जाएं तो किसी भी पार्टी के अरमानों पर पानी फेर सकते हैं। यूपी की राजनीतिक गलियारों में इन दिनों कुछ ऐसे ही दल उभर आए हैं, जो मिलकर एक नया भूचाल लाने की तैयारी कर रहे हैं।

शनिवार, 31 दिसंबर 2011

...तो फिर याद आए मुसलमान

सत्यजीत चौधरी
लोकसभा के चुनाव हों या राज्यों में विधानसभा के, उनकी डुगडुगी बजते ही मुसलमान एकदम से वाजिब और अव्वल हो जाते हैं। यूपी समेत पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के ऐलान के साथ फिर सब पार्टियों को मुसलमानों की याद सताने लगी है। पहला पत्ता चला मायावती ने। उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से मुसलमानों को आरक्षण देने की मांग की थी। केंद्र ने मायावती को जवाब भेजा कि जैसे कि अन्य राज्यों में है, उत्तर प्रदेश सरकार भी अपने यहां मुसलमानों को आरक्षण देने के लिए स्वतंत्र हैं। गेंद पाले में वापस देख मायावती ने चुप्पी साध ली। इस बीच, यूपीए सरकार ने तुरुप का पत्ता चला और सरकारी नौकरियों और शिक्षा में मुस्लमानों को 4.5 फीसद का आरक्षण देकर शेष दलो को भौचक्का कर दिया।

मंगलवार, 20 दिसंबर 2011

सात समंदर पार भी मेरठ की खुशबू का अहसास

सत्यजीत चौधरी
 एक हस्तिनापुर मेरठ में बसता है जो इतिहास के पन्नों में सुनहरे अक्षरों में अंकित है और एक हस्तिनापुर सात समंदर पार भी बसता है, जहां की खुशबू और भारतीय अंदाज बरबस ही लोगों को अपना दीवाना बना लेता है। यहां न केवल भारतीय देवी-देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं, बल्कि 12 एकड़ में बने इस हस्तिनापुर में हर रोज माहौल भक्तिमय होता है।
    यहां एक दर्जन से ज्यादा भारतीय देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के साथ ही अर्जेटीना के भी कई देवी- देवताओं की मूर्तियां स्थापित की गई हैं। खास बात यह है कि वहां भी भगवान गणोश, कृष्ण, सूर्य, नारायण और शिव की प्रतिमाओं के लिए अलग से मंदिरों का निर्माण किया गया है। चूंकि यह हस्तिनापुर है, इसलिए यहां भी पांडवों के मंदिर मौजूद हैं।

रविवार, 18 दिसंबर 2011

राजनीतिक हड़बड़ी नहीं धैर्य का कमाल

सत्यजीत चौधरी
    पिता से मिली विरासत में जिन चीजों को अजित सिंह ने बड़े जतन से संभाला है, वह है धैर्य। कोई भी सियासी सुनामी आए, अजित सिंह निरपेक्ष बने रहते हैं। फिर अचानक दांव चलकर सबको चौंका देते हैं। कभी किसी ने छोटे चौधरी को राजनीतिक हड़बड़ी में नहीं देखा। देश की राजनीति में वह सबको जानते हैं और सब उनको। वह सबको आजमा चुके हैं और सब उनको। फिर भी सियासी पार्टियां उनसे गठबंधन करने को बेचैन रहती हैं।

सोमवार, 12 दिसंबर 2011

अब छोटे चौधरी के सामने बड़ी चुनौतियां

सत्यजीत चौधरी
      चौधरी अजित सिंह एक बार फिर सुर्खियों में हैं, उन्हीं वजहों से जिनसे वह अकसर रहते हैं, यानी गठबंधन। लंबे अर्से के बाद छोटे चौधरी कांग्रेस और कांग्रेस छोटे चौधरी को आजमाने जा रहे हैं। इस बार मामला कई कोणों से दिलचस्प है। अजित सिंह ने ऐसे मौके पर कांग्रेस का हाथ थामा है, जब केंद्र सरकार करप्शन और उसे लेकर देश•ार में हो रहे विरोध की वजह से मुसीबत में है। उत्तर प्रदेश विधानसभा  के चुनाव भी सिर पर हैं और लाख कोशिशों के बावजूद राहुल गांधी का जादू सिर पर चढ़ने को तैयार नहीं है। कांग्रेस अजित की मदद से यूपी में कुछ सीटों पर निशाना साधने की सोच रही है। तीसरा मामला क्रेडिड का है। जाट अजित सिंह पर निसार हैं और उनके सिवा किसी और को अपना नेता मानने को तैयार नहीं हैं। जाटों को आरक्षण देने के मुद्दे पर सरकार पर भारी दवाब है। अजित सिंह चाहते हैं कि केंद्र उनकी शर्त पर जाटों के लिए आरक्षण की घोषणा करे।