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शनिवार, 3 दिसंबर 2011

..ताकि चलता रहे विकास का पहिया

सत्यजीत चौधरी
जी में आता है ये मुर्दा चांद-तारे नोच  लूं
इस किनारे नोच लूं, उस किनारे नोच  लूं
एक-दो का जिक्र क्या, सारे के सारे नोच लूं
ऐ गम—ए—दिल क्या करूं, ऐ वहशत—ए—दिल क्या करूं....!!!

       असरारुल हक मजाज यानी मजाज लखनवी की नज्म के इस टुकड़े से यह लेख शुरू करने के पीछे मंशा सिर्फ यह है कि देश में मौजूदा हालात काफी कुछ उनकी जुनूनी कैफियत से मेल खा रहे हैं। महंगाई,बेजोरगारी और अनिश्चितता ने आम भारतीय में कुछ ऐसी ही झुंझलाहट और तड़प भर दी है। आजादी के बाद से लेकर अब तक ऐसी स्थिति कभी पैदा नहीं हुई थी। बुनियादी ढांचागत क्षेत्र में भारी गिरावट, वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में आर्थिक विकास दर का घटकर 6.9 रह जाना और इस सबके के चलते महंगाई का आसमान पर बैठकर नीरो की तरह बांसुरी बजाना बेचैन कर देने वाली घटनाएं हैं।

रविवार, 23 अक्टूबर 2011

कौन करे खाकी की सुरक्षा ?

 अपनी बात 
   पुलिस के बारे में लिखने के लिए सोचते ही दिमाग में इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस रहे एएन मुल्ला की एक टिप्पणी कौंध जाती है—यूपी पुलिस इज बिगेस्ट आर्गेनाइज्ड गैंग आफ क्रिमिनल्स। न्यायमूर्ति मुल्ला की इस टिप्पणी का सच आज भी अपनी पूरी शिद्दत के साथ कायम है। पुलिस का जिक्र सुनते ही आम आदमी के कई बार रोंगटे खड़े हो जाते हैं। पुलिस की एक खूंखार छवि लोगों के दिमाग में घर कर चुकी है। ज्यादातर लोगों का मानना है कि पुलिस वाले बिना गालियों के बात नहीं करते। सच उगलवाने के लिए हैवान बन जाते हैं। फर्जी एनकाउंटर में बेकुसूरों को मौत के घाट उतार देने में उनको मजा आता है। मासूम बच्चों के बाल पकड़कर धुनने में वह थ्रिल महसूस करते हैं। रिश्वत उनका धर्म-ईमान है। अपराधियों के साथ उनका याराना होता है और शरीफों को जूते की नोक पर रखती है। नेताओं के इशारे पर नाचती है और उनके लिए उल्टे-सीधे काम करती है।