मंगलवार, 11 मार्च 2014
’हरियाणा से खास मुलाकातें’ का विमोचन
रविवार, 9 मार्च 2014
पनडुब्बी, पोत निर्माण में भारत को होना होगा आत्मनिर्भर
सत्यजीत चौधरी
मौजूदा दौर में भारतीय नौसेना अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। पिछले एक साल में नौसेना की पनडुब्बियों और युद्धक पोतों में दस से ज्यादा दुर्घटनाएं हो चुकी हैं। कई अफसरों और नौसैनिकों को जान गंवानी पड़ी। पनडुब्बी आईएनएस सिंधुरत्न हादसे के फौरन बाद नौसेना प्रमुख एडमिरल डीके जोशी को नैतिक रूप से जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। आईएनएस कोलकाता में दुर्घटना के ताजा मामले के बाद भाजपा ने रक्षा मंत्री एके एंटनी से त्यागपत्र की मांग रख दी।
सोमवार, 3 मार्च 2014
रावत कि कच्ची राह
उत्तराखंड में हरीश रावत को विरासत में जो सत्ता मिली है, उसकी चूलें हिली हुई हैं। सरकार की छवि पर डेंट पड़ा हुआ है, उसे रिपेयर करना है। नौकरशाहों में विश्वास बहाली कर उन्हें ठप पड़े विकास कार्यों से जोडऩा है। नाराज मीडिया को मनाना है, ताकि सही सूचना शासन तक पहुंच सके। इनमें सबसे बड़ा काम है, प्राकृतिक आपदा के बाद उपेक्षा की शिकार जनता को यह समझाना कि अब उसके साथ न्याय नहीं होगा। इन सबसे ऊपर है लोकसभा चुनाव के लिए पार्टी को तैयार करना। रेत घड़ी तेजी से सरक रही है और हरीश रावत जानते हैं कि उन्हें बिना रुके अनथक काम करना होगा, वरना जिस चुनावी मिशन पर उन्हें उत्तराखंड भेजा गया है, वह धरा रह जाएगा।
इन तमाम चुनौतियों के साथ उन्हें पार्टी के भीतर खेमेबाजी से निपटना है। कहते हैं कि सबको खुश करना नामुमकिन है, लेकिन हरीश रावत को यह असंभव काम भी कर दिखाना है।
हरीश कड़े फैसले ले रहे हैं और जनता तक सीधी पहुंच बनाने के लिए ग्रास रूट तक जा रहे हैं। शायद यही वजह है कि लोगों को उनमें नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल का फ्यूजन नजर आ रहा है। हरीश रावत की जद्दोजहद प्रदेश की राजनीति में क्या असर डालेगी, विपक्ष भी इसके इंतजार में है।
इन तमाम चुनौतियों के साथ उन्हें पार्टी के भीतर खेमेबाजी से निपटना है। कहते हैं कि सबको खुश करना नामुमकिन है, लेकिन हरीश रावत को यह असंभव काम भी कर दिखाना है।
हरीश कड़े फैसले ले रहे हैं और जनता तक सीधी पहुंच बनाने के लिए ग्रास रूट तक जा रहे हैं। शायद यही वजह है कि लोगों को उनमें नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल का फ्यूजन नजर आ रहा है। हरीश रावत की जद्दोजहद प्रदेश की राजनीति में क्या असर डालेगी, विपक्ष भी इसके इंतजार में है।
आतंक का राजनीतिकरण
सत्यजीत चौधरी
राजीव गांधी के हत्यारों की फांसी की सजा माफ किए जाने के फौरन बाद सभी दोषियों की रिहाई के बारे में तमिलनाडु सरकार के अप्रत्याशित और त्वरित फैसले के एलान पर केंद्र में कांग्रेसनीत सरकार और कांग्रेस पार्टी की तरफ से दो मार्मिक बयान आए। पहला बयान एक बेटे का था तो दूसरा देश के प्रधानमंत्री का। अमेठी का दौरा कर रहे कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी जब पूरब गांव में एक जनसभा को संबोधित कर रहे थे तो उनके पीएस ने जयललिता की घोषणा के बारे में उनको सूचना दी। राहुल खुद को रोक नहीं सके। दिल की बात जनता के सामने रख दी। कहा, मेरे पिता जी की हत्या हुई थी। उन्होंने देश के लिए जान दी थी। हमारे पिता या परिवार की बात नहीं है ।देश की बात है ,अगर कोई आदमी प्रधानमंत्री की हत्या कर दे और उसे छोड़ दिया जाए जिस देश में प्रधानमंत्री के हत्यारों को छोड़ दिया जाता है, उसमें आम आदमी को न्याय की उम्मीद कैसे की जा सकती है सोचने की बात है। मेरे पिता के हत्यारे छोड़े जा रहे और मैं निराश हूं।
शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2014
हत्या पर राजनीति !

‘सजा-ए-मौत’, तीन शब्दों की यह अदालती टर्मिनोलॉजी अंदर तक हिला कर रख देती है। सजा—ए—मौत यानी हाड़-मांस एक व्यक्ति की सांसों के आगे फुलस्टाप लगा देने की अंतिम न्यायिक लाचारी। इस फैसले के आगे न न्याय की किताब कुछ कहती है और न ही कानून बनाने वाला इंसान कुछ कर सकता है। अर्थात उस व्यक्ति ने ऐसा दुर्लभतम अपराध किया है, जिसके लिए इस सजा से कम कुछ नहीं हो सकता है। हिटलर, जोसेफ मुलोसिनी, पोट पॉल, ईदी अमीन, सद्दाम हुसैन, ओसामा बिन लादेन, ऑगस्टो पिनोशे, मुअम्मर गद्दफी बहुत लंबी लिस्ट है.कुछ ने खुद जान दे दी, कुछ को जनता ने मार दिया और कुछ सिस्टम या सरकार के हाथ मारे गए। जो अप्राकृतिक मौत मरने से बच गए, वे तिल-तिल कर मरे। इसमें कुछ अपवाद हो सकते हैं, जैसे सैन्य शासन द्वारा पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी देने का मामला। खैर कहने का मतलब यह है कि पूरी दुनिया में गुनहगार को कानून द्वारा जल्द से जल्द सजा देने का प्रावधान है। सिर्फ भारत ही इससे अछूता है। अफजल गुरु और कसाब के मामलों को छोड़ दिया जाए तो यहां पूर्व प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री और दूसरे बड़े नेताओ के हत्यारों को मिली मौत की सजा पर सियासी गोटियां चली जाती हैं। मानवीयता और दया की आड़ वोट का कारोबार होता है।
अब चूंकि लोकसभा के चुनाव करीब हैं तो दया की राजनीति हिलोरे लेने लगी है। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा पाए कई लोगों की सजा को उम्रकैद में तब्दील किया था तो उसी समय राजीव गांधी के हत्यारों और दिल्ली बम कांड के दोषी देवेेंदर सिंह भुल्लर के रिश्तेदारों ने अपने वकीलों को सक्रिय कर दिया था।
मंगलवार, 18 फ़रवरी 2014
उम्मीदों के मुख्यमंत्री !
सत्यजीत चौधरी
पहाड़ की तुलना धैर्य से की जाती है। अडिग—अविचल खड़ा पहाड़ जाने क्या—क्या झेलता है। मौसम की मार, खनन के हथोड़े, हिमपात, बरसात, भूस्खलन....@...लेकिन एक वक्त ऎसा भी आता है, जब पहाड़ का सब्र टूट जाता है। उत्तराखंड में बदरीनाथ में प्रकृति का तांडव हुआ, उसकी भयानक अनुगूंज राजनीतिक गलियारों में भी सुनाई दी। जब इस गूंज को अनसुना कर दिया गया तो विजय बहुगुणा की कुर्सी चली गई और हरीश रावत को मुख्यमंत्री का पद मिल गया।कुमाऊं और गढ़वाल के खांचों में बंटे तेरह साल पुराने इस राज्य में गुटबाजी हमेशा हावी रही। कांग्रेस की सरकार रही हो या भाजपा की, खेमेबंदी से नहीं उबर पाईं। दोनों ही दलों की सरकार में मुख्यमंत्री को बदलकर हालात बदलने की जुगत को ही निदान मान लिया गया। मर्ज की असली वजह पहचनने की कोशिश नहीं हुई। तेरह—सवा तेरह साल की इस सरकार की कमान संभालने जा रहे हरीश रावत गुटबाजी पर नियंत्रण पाकर कैसे अपनी सरकार बचा पाएंगे, यह वक्त ही बता पाएगा।
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